गुप्‍त गोदावरी- जो आज भी अबूझ पहेली बनी है

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Thursday, September 24, 2026

चित्रकूट की नदियां: नाप हुई, सूची बनी, आदेश हुए—फिर अतिक्रमण क्यों नहीं हटा?

 

ग्रामोदय के छात्र जीवन में मंदाकिनी के लिए ‘डिजायर ग्रुप’ से शुरू हुआ संघर्ष विधानसभा तक पहुंचा; सवालों के जवाब में सरकार ने सीमांकन, सूची और पंचनामे की बात मानी—फिर पांच साल बाद नदी की सीमा दोबारा क्यों खोजी जा रही है?

संदीप रिछारिया | चित्रकूट

चित्रकूट की नदियों का सवाल केवल पानी का सवाल नहीं है। यह उस भूगोल का सवाल है जिसने चित्रकूट को चित्रकूट बनाया। मंदाकिनी, पयस्विनी और सरयू यहां केवल जलधाराएं नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था, संस्कृति, पर्यटन और स्थानीय जीवन की आधाररेखाएं हैं।

इसीलिए इन नदियों पर अतिक्रमण का सवाल जितना पुराना है, उतना ही पुराना वह संघर्ष भी है जो समय-समय पर प्रशासन, जनप्रतिनिधियों और समाज के बीच दिखाई देता रहा है।

लेकिन उनकी भूमिका को केवल एक पूर्व विधायक के रूप में देखना इस कहानी को छोटा कर देना होगा।


नदी से रिश्ता राजनीति से पहले का

नीलांशु चतुर्वेदी का मंदाकिनी से जुड़ाव उनके सार्वजनिक जीवन के राजनीतिक पड़ावों से पहले का बताया जाता है।

ग्रामोदय विश्वविद्यालय में अध्ययन के दौरान ही उन्होंने मंदाकिनी की स्थिति को लेकर लोगों को जोड़ने के लिए ‘डिजायर ग्रुप’ बनाया और नदी के पुनर्जीवन के प्रयास शुरू किए। स्थानीय प्रकाशित विवरण के अनुसार नगर पंचायत अध्यक्ष और विधायक बनने से पहले भी वे मंदाकिनी को बचाने और पुनर्जीवित करने के अभियान से जुड़े थे। बाद में नदी की सफाई और उपचार के लिए तकनीकी विकल्प तलाशने के प्रयास भी किए गए।

यानी मंदाकिनी उनके लिए विधानसभा का कोई अचानक उठा हुआ विषय नहीं थी।

पहले नदी के किनारे का संघर्ष था, फिर नगर निकाय का दायित्व आया और बाद में वही सवाल विधानसभा के पटल तक पहुंचा।

यही इस कहानी का महत्वपूर्ण मानवीय पक्ष है।

छात्र से विधायक तक—सवाल वही रहा

विधायक बनने के बाद भी नीलांशु चतुर्वेदी ने विधानसभा में मंदाकिनी और चित्रकूट की दूसरी नदियों से जुड़े प्रश्न लगातार उठाए।

24 फरवरी 2021 को विधानसभा में मंदाकिनी में प्रदूषित पानी छोड़े जाने के मुद्दे पर उन्होंने सरकार से जवाब मांगा। उन्होंने अधिकारियों से मिली जानकारी को अधूरा बताते हुए चित्रकूट के लिए एक समिति बनाने की मांग भी की। विधानसभा रिकॉर्ड में उनका यह हस्तक्षेप दर्ज है।

इसके अगले ही दिन, 25 फरवरी 2021, नदी संरक्षण का सवाल और ज्यादा ठोस रूप में सामने आया।

प्रश्न क्रमांक 688 में उन्होंने सीधे पूछा—

मंदाकिनी, सरयू और पयस्विनी का सीमांकन कब-कब हुआ? क्या नदियों पर अतिक्रमण हुआ है? और क्या इन्हें अतिक्रमण मुक्त करने के लिए व्यापक अभियान की जरूरत नहीं है?

यह सवाल केवल नदी बचाने की अपील नहीं था।

यह प्रशासन से रिकॉर्ड, सीमांकन और कार्रवाई का हिसाब मांगने वाला सवाल था।

सरकार का जवाब—18 अतिक्रमण हट चुके हैं

25 फरवरी 2021 के विधानसभा उत्तर में सरकार ने बताया कि मंदाकिनी, सरयू और पयस्विनी से जुड़े 18 अतिक्रमण चिन्हित कर हटाए जा चुके हैं।

यानी सरकार के आधिकारिक उत्तर में उस समय तस्वीर यह थी कि अतिक्रमण चिन्हित भी हुए और कार्रवाई भी हो चुकी थी।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

बल्कि यहीं से उसका सबसे महत्वपूर्ण अध्याय शुरू होता है।

दस महीने बाद पयस्विनी फिर नापी गई

यदि फरवरी 2021 तक अतिक्रमण हट चुके थे, तो उसी वर्ष दिसंबर में पयस्विनी की फिर से नाप क्यों हुई?

10 मार्च 2022 को नीलांशु चतुर्वेदी ने विधानसभा में प्रश्न क्रमांक 1275—“पयस्वनी नदी का संरक्षण” उठाया।

सरकार ने बताया कि एसडीएम मझगवां के 1 दिसंबर 2021 के आदेश के पालन में 8 से 11 दिसंबर 2021 तक पयस्विनी नदी की नाप कराई गई।

और इस बार सरकारी जवाब में तीन महत्वपूर्ण दस्तावेजों की पुष्टि हुई—

सीमांकन रिपोर्ट तैयार हुई।
अतिक्रमणकारियों की सूची तैयार हुई।
स्थल पंचनामे तैयार हुए।

सरकार ने यह भी बताया कि संबंधित दस्तावेज विधानसभा पुस्तकालय में परिशिष्ट के रूप में रखे गए हैं।

यहीं से सवाल और गंभीर हो जाता है।

फरवरी 2021 में 18 अतिक्रमण हट चुके थे।

दिसंबर 2021 में पयस्विनी की फिर नाप हुई।

और उस नाप में अतिक्रमणकारियों की सूची तथा पंचनामे फिर तैयार हुए।

तो दोनों सरकारी तस्वीरों के बीच यह अंतर आया कहां से?

यही इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेजी प्रश्न है।

सूची बनी, लेकिन नाम सार्वजनिक क्यों नहीं?

आज भी सबसे जरूरी दस्तावेज वही 2021 की पयस्विनी सीमांकन रिपोर्ट का परिशिष्ट है।

किसके नाम थे?

किस खसरे पर कब्जा था?

कितनी भूमि नदी की थी?

किसे नोटिस मिला?

किसके खिलाफ धारा 248 की कार्रवाई हुई?

किसका कब्जा हटाया गया?

किसका नहीं?

किस मामले में बेदखली आदेश हुआ?

और सबसे महत्वपूर्ण—

जिस अतिक्रमण को हटाया गया, उसका मौके का पंचनामा कहां है?

इन सवालों का उत्तर केवल भाषण या प्रेस विज्ञप्ति से नहीं मिलेगा।

इसके लिए वही मूल दस्तावेज खोलना होगा जिसे सरकार ने विधानसभा पुस्तकालय में रखा था।

इसलिए किसी व्यक्ति का नाम बिना मूल परिशिष्ट देखे सार्वजनिक करना उचित नहीं होगा।

लेकिन सरकार से उस सूची को सार्वजनिक करने और नामवार कार्रवाई का हिसाब देने की मांग पूरी तरह दस्तावेजी आधार पर की जा सकती है।

नीलांशु के सवाल यहीं नहीं रुके

मंदाकिनी को लेकर नीलांशु चतुर्वेदी के विधानसभा प्रश्नों की श्रृंखला बताती है कि उनका फोकस केवल एक बार के सीमांकन तक सीमित नहीं रहा।

मार्च 2022 में उन्होंने मंदाकिनी के किनारे बने अवैध मकानों, भवनों, धर्मशालाओं और होटलों की संख्या तथा सरकारी भूमि पर हुए निर्माण का विवरण मांगा। उन्होंने यह भी पूछा कि नदी में मलवा या गंदा पानी डालने वाले होटलों पर क्या कार्रवाई की गई।

दिसंबर 2022 में फिर उन्होंने मंदाकिनी की स्थिति को लेकर सीवर लाइन और प्रदूषण का सवाल उठाया। विधानसभा रिकॉर्ड में उनका प्रश्न दर्ज है कि क्या चित्रकूट की जीवनरेखा मंदाकिनी “काला पानी” जैसी स्थिति भुगत रही है और सीवर लाइन का काम कब पूरा होगा।

2023 में भी उन्होंने मंदाकिनी किनारे लगे अर्जुन के पेड़ों की कटाई और नदी में प्रदूषणयुक्त पानी मिलने का मामला विधानसभा में उठाया।

अर्थात नदी का सवाल उनके विधानसभा कार्यकाल में एक घटना नहीं, लगातार उठाया गया विषय रहा।

और एक सवाल—मंदाकिनी की नाप क्यों नहीं?

10 मार्च 2022 का विधानसभा जवाब एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने लाता है।

जब पयस्विनी की नाप और सीमांकन का रिकॉर्ड सरकार ने प्रस्तुत किया, तब मंदाकिनी की नाप के संबंध में सरकार ने बताया कि उस समय ऐसी कार्रवाई प्रचलित या विचाराधीन नहीं थी।

यानी जिस मंदाकिनी को चित्रकूट की जीवनरेखा कहा जाता रहा, उसकी सीमा को लेकर उस समय तक वह व्यापक वैज्ञानिक सीमांकन नहीं हुआ था जिसकी मांग विधायक लगातार कर रहे थे।

यही वह जगह है जहां आज की स्थिति और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

2026 की बाढ़ ने पांच साल पुराने सवाल फिर सामने ला दिए

2026 की भीषण बाढ़ के बाद नदी और उसके किनारों पर बने निर्माणों का सवाल फिर सामने है।

यूपी और एमपी प्रशासन अब नदी सीमांकन, संभावित अतिक्रमण और बाढ़ क्षेत्र की पहचान की दिशा में फिर काम कर रहे हैं।

यानी जिस सवाल को 2021 में विधानसभा में उठाया गया था—

नदी की वास्तविक सीमा क्या है?

वह सवाल पांच साल बाद भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।

यही इस कहानी का सबसे बड़ा प्रशासनिक प्रश्न है।

NGT भी नदी की जमीन का सीमांकन चाहता था

पयस्विनी और सरयू को लेकर NGT में उठे मामले ने भी नदी भूमि के सटीक सीमांकन की जरूरत पर जोर दिया था।

12 अगस्त 2021 की कार्यवाही में नदी भूमि के टोपोग्राफिकल सर्वे और सटीक सीमांकन तथा अतिक्रमण हटाने की मांग रिकॉर्ड पर थी।

इसका अर्थ साफ है—

नदी की सुरक्षा के लिए केवल पानी की धारा देखना पर्याप्त नहीं माना गया था; नदी भूमि की पहचान भी जरूरी थी।

फिर भी 2026 में वही सीमांकन और अतिक्रमण चिन्हांकन फिर प्रशासनिक एजेंडे पर आ गया।

यहीं से सवाल बनता है—

आदेश और कार्रवाई के बीच पांच साल कहां चले गए?

उपलब्ध रिकॉर्ड में इस देरी का कोई स्पष्ट, समग्र प्रशासनिक स्पष्टीकरण अभी सामने नहीं आता।

इसलिए सवाल किसी अधिकारी या व्यक्ति की मंशा पर नहीं, बल्कि व्यवस्था की जवाबदेही पर होना चाहिए।

नदी को उसकी सिकुड़ी हुई धारा से मत नापिए

2026 की नई कवायद का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यही होना चाहिए।

यदि नदी दशकों के अतिक्रमण से सिकुड़ चुकी है और अब केवल वर्तमान जलधारा को उसकी सीमा मान लिया गया, तो अतिक्रमण ही भविष्य की नदी सीमा बन सकता है।

इसलिए सीमांकन में कम से कम चार अलग-अलग चीजों को साथ देखना होगा—

पहला—वर्तमान सक्रिय जलधारा।

दूसरा—राजस्व अभिलेखों में दर्ज नदी भूमि।

तीसरा—पुरानी और प्राकृतिक नदी धारा।

चौथा—फ्लड-प्लेन और कैचमेंट एरिया।

इसके लिए पुराने राजस्व नक्शे, बंदोबस्त अभिलेख, ऐतिहासिक मानचित्र, सेटेलाइट इमेजरी, DGPS/GIS/Rover सर्वे और अधिकतम बाढ़ स्तर का तुलनात्मक अध्ययन होना चाहिए।

तभी पता चलेगा कि नदी वास्तव में कितनी थी और आज कितनी बची है।

नीलांशु की नदी-यात्रा का असली सवाल

ग्रामोदय में विद्यार्थी जीवन के दौरान मंदाकिनी को लेकर शुरू हुआ स्थानीय प्रयास, फिर डिजायर ग्रुप के माध्यम से नदी पुनर्जीवन की कोशिश, उसके बाद नगर निकाय की जिम्मेदारी और अंततः विधानसभा में नदी सीमांकन, प्रदूषण, अवैध निर्माण, सीवर और पयस्विनी संरक्षण पर लगातार प्रश्न—

यह एक व्यक्ति की राजनीतिक उपलब्धि का प्रचार नहीं, बल्कि एक सार्वजनिक मुद्दे के धीरे-धीरे संस्थागत सवाल बनने की कहानी है।

और यही कारण है कि नीलांशु चतुर्वेदी द्वारा 2021 में पूछे गए सवाल आज फिर प्रासंगिक दिखाई देते हैं।

उन्होंने पूछा था—नदियों का सीमांकन क्यों नहीं?

आज सवाल यह है—

सीमांकन हुआ तो उसका परिणाम क्या निकला?

उन्होंने पूछा था—अतिक्रमणकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं?

आज सवाल है—

2021 की सूची में दर्ज लोगों पर कार्रवाई का रिकॉर्ड कहां है?

उन्होंने पयस्विनी की नाप कराई।

आज सवाल है—

उस नाप के बाद नदी को कितनी जमीन वापस मिली?

और अब जब 2026 में फिर नदी नापी जा रही है, तो सबसे बड़ा सवाल है—

क्या इस बार केवल नदी की बची हुई धारा नापी जाएगी, या अतिक्रमण से पहले वाली नदी को खोजा जाएगा?


पांच साल बाद फिर वही सवाल

2018 — नदी सीमांकन और अतिक्रमण का मुद्दा विधानसभा में।

25 फरवरी 2021 — नीलांशु चतुर्वेदी का प्रश्न; सरकार ने 18 अतिक्रमण हटाए जाने की जानकारी दी।

12 अगस्त 2021 — NGT में नदी भूमि के सीमांकन और अतिक्रमण का मुद्दा।

8–11 दिसंबर 2021 — पयस्विनी की नाप; सीमांकन रिपोर्ट, अतिक्रमणकारियों की सूची और पंचनामे तैयार।

10 मार्च 2022 — विधानसभा में सरकार ने इन दस्तावेजों के अस्तित्व की पुष्टि की।

मार्च 2022 — मंदाकिनी किनारे अवैध मकानों, धर्मशालाओं, होटलों और नदी में प्रदूषण को लेकर फिर सवाल।

दिसंबर 2022 — मंदाकिनी की सीवर लाइन और प्रदूषण पर फिर सवाल।

2023 — नदी किनारे अर्जुन के पेड़ों की कटाई और प्रदूषण का मुद्दा फिर विधानसभा में।

अप्रैल 2026 — NGT में फिर नदी सीमांकन और अतिक्रमण कार्रवाई का प्रश्न।

सितंबर 2026 — बाढ़ के बाद यूपी-एमपी प्रशासन फिर नदी सीमांकन की प्रक्रिया में।


अंत में एक सवाल नहीं, चार सवाल

पयस्विनी की 2021 की सूची कहां है?

उस सूची के कितने लोगों पर कार्रवाई हुई?

2021 के सीमांकन के बाद नदी की कितनी भूमि अतिक्रमण मुक्त हुई?

और सबसे बड़ा—

2026 में होने वाला सीमांकन नदी की वर्तमान सिकुड़ी हुई धारा का होगा या उस प्राकृतिक नदी का, जिसे अतिक्रमण से पहले चित्रकूट जानता था?

क्योंकि नदी को बचाना है तो केवल पानी नहीं बचाना होगा।

नदी की जमीन भी बचानी होगी।
नदी का बहाव भी बचाना होगा।
नदी का कैचमेंट भी बचाना होगा।
और सबसे बढ़कर—नदी की पहचान बचानी होगी।

चित्रकूट की मंदाकिनी, पयस्विनी और सरयू का भविष्य अब नई घोषणाओं से नहीं, पुरानी फाइलों के खुले पन्नों और जमीन पर दिखाई देने वाली कार्रवाई से तय होगा।

Wednesday, September 23, 2026

चित्रकूट में आयुर्वेद का नया अध्याय: आयुष ग्राम में 11वें राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस का भव्य शुभारंभ



आयुष ग्राम में 11वें राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस महोत्सव का भव्य शुभारंभ, आयुर्वेद मेडिकल कॉलेज की स्थापना की मंशा सामने आई

चित्रकूट। राम की तपोभूमि चित्रकूट में आयुर्वेद को लेकर एक नई पहल की आहट सुनाई दी है। आयुष ग्राम चित्रकूट में 11वें राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस महोत्सव का भव्य एवं गरिमामय शुभारंभ हुआ। समारोह में जहां आयुर्वेद की प्राचीन भारतीय चिकित्सा परंपरा, जीवनशैली और आधुनिक स्वास्थ्य चुनौतियों पर चर्चा हुई, वहीं आयुष ग्राम के संस्थापक आचार्य मदन गोपाल बाजपेई ने चित्रकूट में आयुर्वेद मेडिकल कॉलेज स्थापित किए जाने की मंशा सामने रखी।

समारोह का शुभारंभ जिलाधिकारी पुलकित गर्ग एवं आयुष ग्राम के संस्थापक आचार्य मदन गोपाल बाजपेई ने भगवान धन्वंतरि एवं भगवान गणेश की प्रतिमा पर पुष्पांजलि, माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलित कर किया। वैदिक वातावरण में प्रारंभ हुए कार्यक्रम में आयुर्वेद के संरक्षण, संवर्धन, चिकित्सा, शिक्षा और शोध को लेकर विचार साझा किए गए।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि जिलाधिकारी पुलकित गर्ग का आचार्य मदन गोपाल बाजपेई ने माल्यार्पण, अंगवस्त्र एवं श्रीफल भेंट कर सम्मान किया।

स्वागत करते राजकिशोर शिवहरे


आयुष ग्राम के संस्थापक आचार्य मदन गोपाल बाजपेई ने अपने संबोधन में कहा कि आयुर्वेद की वास्तविक क्षमता तभी सामने आएगी, जब चिकित्सक जटिल और कठिन रोगों को चुनौती के रूप में स्वीकार करेंगे।

उन्होंने कहा कि आयुर्वेद के शास्त्रों में चिकित्सा का व्यापक एवं गहन ज्ञान उपलब्ध है। एक चिकित्सक के लिए आवश्यक गुणों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इन गुणों से संपन्न चिकित्सक कठिन रोगों से संघर्ष करने की क्षमता रखता है।

समारोह में आचार्य मदन गोपाल बाजपेई की पुस्तक का विमोचन भी किया गया। उन्होंने पुस्तक के संदर्भ में 15 जटिल रोगों के शास्त्रीय एवं प्रमाण आधारित उपचार का उल्लेख करते हुए आयुष ग्राम में किए गए उपचार के अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि अनेक गंभीर रोगियों के उपचार में आयुष ग्राम की चिकित्सा पद्धति से सकारात्मक परिणाम प्राप्त करने के प्रयास किए गए हैं।

चित्रकूट और आयुर्वेद—ऋषि परंपरा से आधुनिक अनुसंधान तक

चित्रकूट की पहचान केवल धार्मिक नगरी के रूप में नहीं है। इसकी सांस्कृतिक स्मृति में वन, आश्रम, ऋषि परंपरा और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की गहरी छाप है।

रामायण की परंपरा में चित्रकूट वनवास और ऋषि आश्रमों से जुड़ी भूमि रहा है। महर्षि अत्रि और माता अनुसूया की परंपरा सहित अनेक आश्रमों और साधना स्थलों की स्मृतियां आज भी चित्रकूट के सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा हैं।

भारतीय आयुर्वेद की ज्ञान परंपरा भी प्रकृति, आहार, जीवनचर्या और औषधीय वनस्पतियों के अध्ययन से गहराई से जुड़ी रही है। इस दृष्टि से चित्रकूट का प्राकृतिक परिवेश आयुर्वेद के अध्ययन और अनुसंधान की संभावनाओं को आधार प्रदान कर सकता है।

यही कारण है कि चित्रकूट में आयुर्वेद मेडिकल कॉलेज की स्थापना की चर्चा केवल एक शैक्षणिक संस्थान की स्थापना का विषय नहीं है। इसके साथ औषधीय वनस्पति संरक्षण, आयुर्वेदिक अनुसंधान, पंचकर्म, योग, प्राकृतिक चिकित्सा और स्वास्थ्य पर्यटन जैसे अनेक क्षेत्र जुड़े हो सकते हैं।

हालांकि स्थानीय परंपराओं और पौराणिक मान्यताओं को ऐतिहासिक या वैज्ञानिक तथ्य के रूप में स्थापित करने के लिए प्रमाण आधारित अध्ययन आवश्यक होगा, लेकिन चित्रकूट की प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक विरासत आयुर्वेद के आधुनिक विकास के लिए एक विशिष्ट आधार अवश्य प्रस्तुत करती है।

जिलाधिकारी बोले—स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा धन

मुख्य अतिथि जिलाधिकारी पुलकित गर्ग ने कहा कि यह प्रसन्नता का विषय है कि आयुष ग्राम चित्रकूट द्वारा राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस के अवसर पर इतना व्यापक आयोजन किया जा रहा है।

उन्होंने आयुर्वेद को भारत की प्राचीन और समृद्ध चिकित्सा परंपरा का अभिन्न अंग बताते हुए कहा कि भगवान धन्वंतरि हमें यह संदेश देते हैं कि स्वास्थ्य ही मनुष्य का सबसे बड़ा धन है।

जिलाधिकारी ने कहा कि आयुर्वेद केवल बीमारी का उपचार करने वाली पद्धति नहीं, बल्कि जीवनशैली को संतुलित करने की भारतीय दृष्टि भी है। अस्पतालों में बढ़ती भीड़ को चिंता का विषय बताते हुए उन्होंने आयुर्वेद के प्रचार-प्रसार की आवश्यकता पर बल दिया।

उन्होंने आयुष ग्राम के वातावरण की सराहना करते हुए कहा कि अपनी पिछली कई पोस्टिंग में उन्होंने अनेक स्थानों पर कार्य किया, लेकिन इस प्रकार का आयुर्वेद गुरुकुल जैसा वातावरण उन्हें चित्रकूट के आयुष ग्राम में देखने को मिला।

उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि ऐसे आयोजन आयुर्वेद के संरक्षण, संवर्धन एवं व्यापक प्रचार-प्रसार की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

धन्वंतरि वंदना से शुरू हुआ कार्यक्रम

समारोह की शुरुआत भगवान धन्वंतरि और भगवान गणेश के पूजन से हुई। अतिथियों द्वारा प्रतिमा पर पुष्पांजलि एवं माल्यार्पण के बाद दीप प्रज्वलित किया गया।

इसके पश्चात अतिथियों का स्वागत एवं सम्मान किया गया। भगवान धन्वंतरि को समर्पित आयुर्वेद विषयक रचना का पाठ भी हुआ, जिसने पूरे आयोजन को भारतीय चिकित्सा परंपरा और आध्यात्मिक चेतना से जोड़ दिया।

इसके बाद आचार्य मदन गोपाल बाजपेई ने आयुर्वेद के शास्त्रीय पक्ष, जटिल रोगों के उपचार और आयुष ग्राम की गतिविधियों पर विस्तार से प्रकाश डाला। पुस्तक का विमोचन कार्यक्रम का एक प्रमुख आकर्षण रहा।

विशेषज्ञ चिकित्सकों ने भी आयुर्वेद की विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों, पंचकर्म तथा जटिल रोगों के उपचार के अनुभवों पर अपने विचार रखे।

देश के विभिन्न हिस्सों से पहुंचे आयुर्वेद विशेषज्ञ

राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस महोत्सव में देश के विभिन्न हिस्सों से आए आयुर्वेद विशेषज्ञों की उपस्थिति रही।

इनमें वैद्य राजेश ठक्कर, अहमदाबाद, वैद्य दत्तात्रेय पांडे, नक्षत्र आयुर्वेदिक हॉस्पिटल समूह, वैद्य चंद्र कुमार देशमुख, जिन्हें भारत एवं नेपाल सरकार के राज्यपाल स्तर से वैद्यरत्न-2025 सहित सम्मान मिलने का उल्लेख किया गया, तथा वैद्य रजनीश आलोनकर, अष्टांग आयुर्वेद हॉस्पिटल, छिंदवाड़ा, मध्य प्रदेश प्रमुख रूप से शामिल रहे।

वैद्य रजनीश आलोनकर को विशुद्ध आयुर्वेद एवं पंचकर्म चिकित्सा में लगभग दो दशक के अनुभव के लिए जाना जाता है।

इन विशेषज्ञों की सहभागिता ने कार्यक्रम को स्थानीय आयोजन से आगे बढ़ाकर व्यापक आयुर्वेदिक विमर्श का स्वरूप दिया।

प्रायोजक एवं विशिष्ट अतिथियों की रही सहभागिता

कार्यक्रम के प्रायोजक श्री रणजीत आनंद पुराणिक, प्रबंध निदेशक, श्री धूतपापेश्वर लिमिटेड, मुंबई भी समारोह में उपस्थित रहे।

चित्रकूट के पूज्य संत मदन दास जी ने भी कार्यक्रम में सहभागिता की।

इसके अलावा गायत्री परिवार के राम नारायण त्रिपाठी, राजकुमार ओझा, प्रदीप तिवारी, सेवा भारती के जिला महामंत्री राज किशोर शिवहरे, प्रताप पांडे, डॉ. सचिन्द्र उपाध्याय, प्राचार्य सीमा विश्वकर्मा, पूर्व पीडब्ल्यूडी मंत्री चंद्रिका प्रसाद उपाध्याय, डॉ. सीताराम गुप्ता सहित अनेक गणमान्य नागरिक, सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षाविद एवं चिकित्सक मौजूद रहे।

विभिन्न प्रदेशों से आए आयुर्वेद चिकित्सकों की सहभागिता ने समारोह की गरिमा बढ़ाई।

आयुर्वेद के साथ स्वास्थ्य पर्यटन की भी संभावना

चित्रकूट में आयुर्वेद मेडिकल कॉलेज की स्थापना की मंशा सामने आने के बाद इस पहल से जुड़ी संभावनाओं पर भी चर्चा स्वाभाविक है।

चित्रकूट प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं और पर्यटकों को आकर्षित करता है। यदि आयुर्वेद शिक्षा एवं चिकित्सा का संस्थागत विकास होता है तो यहां पंचकर्म, योग, प्राकृतिक चिकित्सा, औषधीय वनस्पति उद्यान और आयुर्वेद आधारित वेलनेस सेवाओं को भी विकसित किया जा सकता है।

इससे चित्रकूट की पहचान धार्मिक पर्यटन के साथ आध्यात्मिक एवं स्वास्थ्य पर्यटन के संभावित केंद्र के रूप में भी विस्तारित हो सकती है।

इसके लिए स्थानीय वनस्पतियों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण, औषधीय पौधों का संरक्षण, आयुर्वेदिक अनुसंधान और प्रमाण आधारित चिकित्सा को आधार बनाना होगा।

अब संकल्प को संस्थान में बदलने की चुनौती

राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस समारोह में आयुर्वेद मेडिकल कॉलेज की स्थापना की मंशा सामने आना महत्वपूर्ण पहल है, लेकिन इसे धरातल पर उतारने के लिए लंबी संस्थागत प्रक्रिया की आवश्यकता होगी।

भूमि, वित्तीय संसाधन, अधोसंरचना, मान्यता, शैक्षणिक पाठ्यक्रम, योग्य चिकित्सक एवं शिक्षक, अस्पताल की व्यवस्था और अनुसंधान सुविधाएं—इन सभी पहलुओं पर स्पष्ट कार्ययोजना बनानी होगी।

यही वह बिंदु है जहां चित्रकूट की सांस्कृतिक विरासत और आधुनिक चिकित्सा शिक्षा एक-दूसरे से जुड़ सकती हैं।

धन्वंतरि से चित्रकूट तक—एक नई संभावना

चित्रकूट की मिट्टी में राम की स्मृति है, कामदगिरि की परिक्रमा है, मंदाकिनी की धारा है और ऋषि-परंपरा की दीर्घ स्मृति है। इसी भूमि पर भगवान धन्वंतरि की आराधना के साथ आयुर्वेद दिवस का आयोजन अपने आप में एक सांस्कृतिक संदेश देता है।

आयुर्वेद को यदि केवल अतीत की विरासत न मानकर शिक्षा, अनुसंधान, प्रमाण आधारित चिकित्सा और आधुनिक स्वास्थ्य आवश्यकताओं से जोड़ा जाए तो चित्रकूट इसके लिए एक विशिष्ट प्रयोगभूमि बन सकता है।

आयुष ग्राम में आयोजित 11वें राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस महोत्सव ने इसी संभावना को सामने रखा है।

अब देखना यह है कि आयुर्वेद मेडिकल कॉलेज की यह मंशा घोषणा से आगे बढ़कर किस रूप में आकार लेती है। यदि यह संकल्प संस्थागत रूप लेता है तो चित्रकूट की पहचान में एक नया अध्याय जुड़ सकता है—जहां अध्यात्म के साथ आयुर्वेद, प्रकृति के साथ स्वास्थ्य और परंपरा के साथ आधुनिक अनुसंधान का संगम दिखाई दे।


Thursday, September 3, 2020

चित्रकूटधाम में अधर्म लीला* ( भाग एक)

 - चार किलोमीटर प्रतिबंधित है मादक पदार्थो की बिक्री

*- रामघाट,निर्मोही तिराहा, चोगलिया बाजार,पुराना बस स्टैंड,रामायण मेला के सामने व पीछे,रैन बसेरा के अंदर व बाहर,शिवरामपुर रोड, मलकाना रोड,कालकन मन्दिर के पास में बिक रही शराब व गांजा*

*- हर मोहल्ले में मौजूद है सट्टे का बुकी* *नयागांव,खटकाना,मलकाना,तीर्थराजपुरी के तराई के इलाके में उतर रही है कच्ची शराब*


*करोना काल चल रहा है। करोना से बचने के लिए गाइड लाइन दो गज की दूरी,मास्क और सेनेटाइजर जरूरी का नारा तेजी से चल रहा है। इसी काल मे बाजार के कारीगरों ने एक अच्छा और सुगम व्यवसाय खोज निकाला है। यह व्यवसाय है सेनेटाइजर की अधिकता वाली शराब की बिक्री का। इस व्यवसाय से न केवल पुलिस व आबकारी विभाग को फायदा हो रहा है बल्कि   सरकार को राजस्व की प्राप्ति भी हो रही है। तीर्थनगरी में प्रतिबंध के बाद भी लगभग एक दर्जन स्थानों पर अंग्रेजी व देशी शराब की बिक्री की जा रही है। नदी के तराई वाले इलाकों पर कच्ची महुआ व बेशरम से बनी शराब उतारी भी जा रही है*

चित्रकूट तीर्थ नगरी है। यहाँ पर मांस,मछली,अंडा और शराब की बिक्री पर प्रतिबंध है। वैसे चित्रकूट के जिला बनने के बाद प्रतिबन्ध की दूरी कम कर दी गई थी। बांदा जिला से कर्वी व मऊ तहसीलों को काटकर 2007 में शाहू जी महाराज नगर के नाम से जिला बनाया गया। 2000 में कल्याण सिंह के शासन में चित्रकूट को दो अहम पड़ाव मंडल व जिले के रूप में मिले।

 2005 में तीर्थनगरी से मादक पदार्थो की बिक्री की दूरी घटाकर 10 की बजाय 5 किलोमीटर कर दी गई। लिहाजा नई दुनिया मे बिकने वाली शराब बेडीपुलिया तक सिमट आई। वैसे कर्वी कोतवाली के अंतर्गत कच्ची शराब डेलोरा से लेकर बंधोइन तक कई स्थानों पर उतारी जाती रही है। 

कोरोना काल के कुछ समय पहले से तीर्थनगरी में कई स्थानों पर कच्ची शराब उतरना शुरू हुई तो उनकी बिक्री भी शहर के एक दर्जन स्थानों पर चल रही है। इसके साथ ही स्मैक व अंग्रेजी शराब भी आराम से इसके शौकीनों को मिल रही है। सट्टा का खेल बदस्तूर जारी है तो गांजा (मारिजुआना) की लगभग आधा दर्जन स्थानों पर बिक रहा है।

*मादक पदार्थो की बिक्री वाले स्थान*

*🩸रामघाट,निर्मोही तिराहा, चोगलिया बाजार,पुराना बस स्टैंड,रामायण मेला के सामने व पीछे,रैन बसेरा के अंदर व बाहर,शिवरामपुर रोड, मलकाना रोड,कालकन मन्दिर के पास में शराब व गांजा*

*हर मोहल्ले में मौजूद है सट्टे का बुकी* *नयागांव,खटकानामालकाना,तीर्थराजपुरी के तराई के इलाके में उतरती है कच्ची शराब*

*कार्यवाही के नाम पर शून्य*

पुलिस प्रवक्ता के अनुसार सीतापुर चौकी क्षेत्र में मादक पदार्थो के खिलाफ बहुत दिनों से कोई बड़ी उल्लेखनीय कार्यवाही नही हुई है।

Wednesday, February 22, 2017

मीठी यादों के साथ विदा हुआ नृत्य का विशेष उत्सव


                                    खजुराहो की नृत्‍य भरी शाम
 नटराज के शिष्य परंपरा से जुड़े मनीषियों की प्रस्तुतियों से सजे खजुराहो नृत्य महोत्सव के सात दिन आखिर विदा हो गए। निर्वाण थ्रू डांस की निर्माता और नृत्य भारती, कामायनी, क्लासिकल डांसेज आफ इंडिया सहित तमाम फिल्मों में अभिनय कर चुकी उमा डोगरा के कथक नृत्य की प्रस्तुति इस नृत्य महोत्सव की अंतिम प्रस्तुति बनी। मंगलवार की रात लगभग 9.20 बजे से चालीस मिनट का उनका भावपूर्ण नृत्य लोगों के लिए यादगार बन गया। उमा डोगरा ने खुद कहा कि यह उनके जीवन की सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुति रही। उन्होंने कहा कि वैसे तो उन्होंने देश विदेश के तमाम स्टेजों पर अपना नृत्य प्रस्तुत किया पर यहां पर तो ऐसा लग रहा था कि देवाधिदेव भोले नाथ खुद ही उनका नृत्य देख रहे थे। गीत गोविंद की रचनाओं पर आधारित नृत्य नाटिकाओं में प्रस्तुत किया जाने वाला मार्मिक अभिनय सजीव रहा। देशी और विदेशी पर्यटकों व स्थानीय लोगों की तालियां लम्बे समय तक बजती रहीं।

इसके पूर्व मध्य प्रदेश राज्य पर्यटन विकास निगम के अधिकारी व स्थानीय अधिकारियों ने घोषणा की कि खजुराहो डांस फेस्टिवल अगले पांच वर्षो तक 20 से 26 फरवरी को ही होगा। कार्यक्रम का शुभारंभ निरुपमा एवं राजेन्द्र की समकालीन नृत्य प्रस्तुति से हुआ। तमाम सम्मानों को प्राप्त करने वाली इस जोड़ी ने भरत नाट्यम की प्रस्तुति के दौरान कई बार दर्शकों की आंखों में आंसू ला दिए।

इसके बाद पद्मभूषण गुरु केलुचरण महापात्र की शिष्या ओडिसी नृत्यांगना आलोका कानूनगो ने नृत्य के दौरान श्री कृष्ण और राधा के साथ गोपियों की रास लीला के दर्शन कराए। खजुराहो डांस फेस्टिवल की अंतिम शाम में विदेशी और देशी पर्यटकों के साथ ही स्थानीय लोग भारी संख्या में मौजूद रहे।

Sunday, July 14, 2013

दो घंटे की बरसात से भरा 8 फिट गहरा तालाब

महोबा, स्टाफ रिपोर्टर: जल संरक्षण के लिए दूसरों को नसीहत देने के पहले एसपी ललित कुमार सिंह ने वह कर दिखाया जिसके कारण अब वह हर मिलने वाले को पानी बचाने के लिए तैयार करने का काम कर रहे हैं। बात बहुत पुरानी नही है, लगभग डेढ़ महीने पहले यहां पर आए पुलिस कप्तान ने देखा कि पानी की भारी किल्लत है। शहर में पानी की किल्लत के कारण लोग रात रात जागकर पानी भरने के काम करते हैं। ऐसे में उन्होंने जब सुना कि मुख्यमंत्री ने यहां के तालाबों को पुर्नजीवन देने के लिए घोषणाएं की हैं, और डीएम खुद भी किसानों के पास जा जाकर उन्हें तालाब खोदने के लिए प्रेरित कर रहे हैं तो उन्होंने पुलिस लाइन में पूर्व कप्तान देवी सिंह अशोक के द्वारा खुदवाए गए छोटे से तालाब पर काम लगवा दिया और तीन दिनों के अंदर गुरदयाल सिंह कटियार ने एक बड़े तालाब की शक्ल देकर खुदवा दिया। इसको बनाने के साथ ही पुलिस लाइन की अधिकांश जमीन का स्लोप इस तालाब में कर दिया। इसके लिए पूरी लाइन में पक्की नालियों का भी निर्माण कराया गया। सबसे सुखद बात यह रही कि 18 जून को बरसे दो घंटे के तेज पानी में यह तालाब लबालब भर गया। जिसके कारण इसको देखकर सभी को हैरत हो रही है। तालाब में पानी भरते देखकर एसपी ललित कुमार सिंह अब अपने पास आने वाले हर एक व्यक्ति को पानी के संरक्षण के लिए न केवल प्रेरित कर रहे हैं बल्कि उसे बताने का प्रयास भी करते हैं कि जब एक बरसात से एक तालाब भर सकता है तो बाकी के तालाब क्यों नहीं। केवल लगन के साथ सभी को लगने की अवश्यकता है फिर किसी भी गांव में पीने व सिंचाई के पानी की आवश्यकता नही रहेगी। वह बताते हैं कि जल्द ही इस तालाब में पैडल वोट डलवाने के साथ ही कमल लगवाया जाएगा। साथ ही तालाब के बगल में खाली जमीन पर नव गृह व नक्षत्र वाटिका भी बनाई जाएगी। जिससे आम लोगों को पौधों को संरक्षित करने के बारे में प्रेरणा मिले।

झूमकर बरसी बरखा ने दी तालाबों को संजीवनी

संदीप रिछारिया, महोबा: कम से कम अब तो पानी के लिए सिर नहीं फूटेंगे, अगर यही हाल रहा है तो इस साल क्या आने वाले कई सालों तक महोबा में पानी के लिए किच किच नही होगी। यह और कुछ ऐसे ही जुमले लोगों के मुंह से अनायास ही निकल रहे हैं। इस बार तो पानीदार बुंदेलों को पानी ने भी अपनी पानीदारी दिखा दी है। केवल जून महीने के 12 दिनों के भीतर ही 340 मिमी बारिश रिकार्ड की गई है। इस बारिश के चलते जहां जिले में मौजूद लगभग हर जलाशय की शक्ल बदली सी दिखाई दे रही है, वहीं जिलाधिकारी की पहल पर खोदे गए नए खेत तालाब भी पानी से लबालब भरे दिखाई दे रहे हैं। सिचाई विभाग के तार बाबू नारायण सिंह की मानें तो इस बार की बरसात वास्तव में सुकून देने वाली हो रही है। हो सकता है कि वर्ष 2003 के बाद इस साल सभी तालाब व बंधे पूरी क्षमता से भर जाएं। उन्होंने पिछले साल 600 मिमी पानी गिरा था, वरना पिछले 9 सालों में कभी भी बरसात 500 मिमी से ऊपर हुई ही नहीं। वैसे उस बरसात से कोई ज्यादा फायदा नही मिला, क्योंकि एक दिन में 50 मिमी पानी गिरने के बाद पन्द्रह दिनों के सूखे और तेज धूप ने उस पानी को उड़ा दिया। वह बताते हैं कि अभी शहर के बीजा सागर व कीरत सागर दो ही तालाब हैं जो डेड स्टोरेज के आसपास हैं। इसके अलावा मदन सागर, कल्याण सागर, दसरापुर, अर्जुन बांध, चंद्रावल बांध, कबरई बांध, मझगंवा बांध, उर्मिल बांध, बेलासागर, थाना तालाब, उरवारा तालाब, रैपुरा तालाब, सलारपुर तालाब, रहलिया तालाबों में पानी डेड स्टोरेज क्षमता से आगे बढ़कर दो फिट से लगाकर 8 फिट तक आ चुका है। पानी का लगातार बरसना सुकून दे रहा है। जून के महीने में ही इतनी अच्छी बरसात हो गई है कि नए तालाबों के साथ ही पुराने तालाबों को जल की संजीवनी मिल गई। इस बार नए खेत तालाब खुदवाने का लक्ष्य 100 का था। लगभग सभी तालाबों में भरपूर पानी आ गया है। इससे न केवल किसानों को फायदा मिलेगा बल्कि जलस्तर भी बढे़गा। आने वाले वषरें में किसान और भी तालाब बनाएंगे। जिससे महोबा की पानीदारी और बढ़ सके।-अनुज कुमार झा, डीएम तालाबों में पानी की स्थिति .. 1 जुलाई मदन सागर - 5.25 फिट कीरत सागर- डेढ स्टोरेज. लगभग दस फिट पानी कल्याण सागर- 5 बीजासागर- डेढ स्टोरेज दसरापुरा- 6 उरवारा तालाब- 3 रैपुरा तालाब- 8 थाना तालाब- 2 सलारपुर तालाब- 2 फिट रहलिया तालाब- 3 फिट अर्जुन बांध- 179.79 मीटर चंद्रावल बांध - 148.74 मीटर कबरई बांध- 149.04 मीटर मझगवां बांध -217.93 मीटर उर्मिल बांध- 230.00 मीटर

चारागाहों से जल्द हटवाया जाएगा अतिक्रमण

महोबा, स्टाफ रिपोर्टर: जल्द ही अभियान चलाकर सार्वजनिक चारागाहों को न केवल अतिक्रमणकारियों से मुक्त कराया जाएगा, बल्कि उनकी सुरक्षा के लिए बाउंड्रीवाल व तार बाढ़ से बंद भी कराया जाएगा। यह बातें जिलाधिकारी अनुज कुमार झा ने डीएम कार्यालय के पीछे स्थित पौराणिक स्थल श्री राम कुंड आश्रम की गौशाला का हाल सुनने के बाद कही। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक गौशालाओं की जमीनों पर केवल गौवंश का अधिकार है। इन जमीनों को न केवल खाली कराया जाएगा बल्कि उनकी सुरक्षा की भी पूरी व्यवस्था की जाएगी। चारागाहों की जमीनों के साथ ही गौशालाओं के सही संचालन के लिए समाज के लोगों व अधिकारियों केएक समिति बनाकर संचालन किया जाएगा। शुक्रवार को दोपहर श्री राम कुड के अत्यंत वृद्ध महंत ने जिलाधिकारी को बताया कि आश्रम की गौशाला का हाल काफी खराब है। अराजकतत्व यहां पर हर गलत काम करते हैं और मना करने पर मारते हैं। उन्होंने बताते हुए कहा कि साहब जिंदगी बीत गई, नागा साधू हैं, कभी किसी से कुछ मांगा नहीं, अब अराजक तत्वों द्वारा अपमान सहन नहीं होता, आप इस आश्रम को अपने पजेशन में लें लें तो अति दया होगी, मेरी इच्छा यह है कि कम से कम एक बार आप आश्रम को देख तो लें। डीएम अनुज कुमार झा ने कहा कि गौशाला का हाल खराब है तो यह निसंदेह चिंता का विषय है। उन्होंने आश्रम में आने की बात करते हुए कहा कि जिले की सभी गौशालाओं में भूसा व चारे की व्यवस्था के मुकम्मल इंतजाम किए जा रहे हैं। कहा कि सार्वजनिक चारागाहों की जमीनों को तार बाढ़ से बंद करवाकर उसका उपयोग समाज के लोगों व अधिकारियों की संयुक्त कमेटी से करवाया जाएगा। इस दौरान नरसिंह कुटी के महंत विश्वम्भर दास व आल्हा परिषद के अध्यक्ष शरद तिवारी ने बताया कि यह स्थान रामायण काल का है। यहां के कुंड का पानी तमाम बीमारियों को दूर करता है। गौशाला में गायों की कम होती संख्या का कारण उन्हें कसाईखाने में भेजा जाना है। डीएम ने इस प्रकरण पर गंभीरता से विचार कर कार्यवाही करने की बात कही।