ग्रामोदय के छात्र जीवन में मंदाकिनी के लिए ‘डिजायर ग्रुप’ से शुरू हुआ संघर्ष विधानसभा तक पहुंचा; सवालों के जवाब में सरकार ने सीमांकन, सूची और पंचनामे की बात मानी—फिर पांच साल बाद नदी की सीमा दोबारा क्यों खोजी जा रही है?
संदीप रिछारिया | चित्रकूट
चित्रकूट की नदियों का सवाल केवल पानी का सवाल नहीं है। यह उस भूगोल का सवाल है जिसने चित्रकूट को चित्रकूट बनाया। मंदाकिनी, पयस्विनी और सरयू यहां केवल जलधाराएं नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था, संस्कृति, पर्यटन और स्थानीय जीवन की आधाररेखाएं हैं।
इसीलिए इन नदियों पर अतिक्रमण का सवाल जितना पुराना है, उतना ही पुराना वह संघर्ष भी है जो समय-समय पर प्रशासन, जनप्रतिनिधियों और समाज के बीच दिखाई देता रहा है।
लेकिन उनकी भूमिका को केवल एक पूर्व विधायक के रूप में देखना इस कहानी को छोटा कर देना होगा।
नदी से रिश्ता राजनीति से पहले का
नीलांशु चतुर्वेदी का मंदाकिनी से जुड़ाव उनके सार्वजनिक जीवन के राजनीतिक पड़ावों से पहले का बताया जाता है।
ग्रामोदय विश्वविद्यालय में अध्ययन के दौरान ही उन्होंने मंदाकिनी की स्थिति को लेकर लोगों को जोड़ने के लिए ‘डिजायर ग्रुप’ बनाया और नदी के पुनर्जीवन के प्रयास शुरू किए। स्थानीय प्रकाशित विवरण के अनुसार नगर पंचायत अध्यक्ष और विधायक बनने से पहले भी वे मंदाकिनी को बचाने और पुनर्जीवित करने के अभियान से जुड़े थे। बाद में नदी की सफाई और उपचार के लिए तकनीकी विकल्प तलाशने के प्रयास भी किए गए।
यानी मंदाकिनी उनके लिए विधानसभा का कोई अचानक उठा हुआ विषय नहीं थी।
पहले नदी के किनारे का संघर्ष था, फिर नगर निकाय का दायित्व आया और बाद में वही सवाल विधानसभा के पटल तक पहुंचा।
यही इस कहानी का महत्वपूर्ण मानवीय पक्ष है।
छात्र से विधायक तक—सवाल वही रहा
विधायक बनने के बाद भी नीलांशु चतुर्वेदी ने विधानसभा में मंदाकिनी और चित्रकूट की दूसरी नदियों से जुड़े प्रश्न लगातार उठाए।
24 फरवरी 2021 को विधानसभा में मंदाकिनी में प्रदूषित पानी छोड़े जाने के मुद्दे पर उन्होंने सरकार से जवाब मांगा। उन्होंने अधिकारियों से मिली जानकारी को अधूरा बताते हुए चित्रकूट के लिए एक समिति बनाने की मांग भी की। विधानसभा रिकॉर्ड में उनका यह हस्तक्षेप दर्ज है।
इसके अगले ही दिन, 25 फरवरी 2021, नदी संरक्षण का सवाल और ज्यादा ठोस रूप में सामने आया।
प्रश्न क्रमांक 688 में उन्होंने सीधे पूछा—
मंदाकिनी, सरयू और पयस्विनी का सीमांकन कब-कब हुआ? क्या नदियों पर अतिक्रमण हुआ है? और क्या इन्हें अतिक्रमण मुक्त करने के लिए व्यापक अभियान की जरूरत नहीं है?
यह सवाल केवल नदी बचाने की अपील नहीं था।
यह प्रशासन से रिकॉर्ड, सीमांकन और कार्रवाई का हिसाब मांगने वाला सवाल था।
सरकार का जवाब—18 अतिक्रमण हट चुके हैं
25 फरवरी 2021 के विधानसभा उत्तर में सरकार ने बताया कि मंदाकिनी, सरयू और पयस्विनी से जुड़े 18 अतिक्रमण चिन्हित कर हटाए जा चुके हैं।
यानी सरकार के आधिकारिक उत्तर में उस समय तस्वीर यह थी कि अतिक्रमण चिन्हित भी हुए और कार्रवाई भी हो चुकी थी।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
बल्कि यहीं से उसका सबसे महत्वपूर्ण अध्याय शुरू होता है।
दस महीने बाद पयस्विनी फिर नापी गई
यदि फरवरी 2021 तक अतिक्रमण हट चुके थे, तो उसी वर्ष दिसंबर में पयस्विनी की फिर से नाप क्यों हुई?
10 मार्च 2022 को नीलांशु चतुर्वेदी ने विधानसभा में प्रश्न क्रमांक 1275—“पयस्वनी नदी का संरक्षण” उठाया।
सरकार ने बताया कि एसडीएम मझगवां के 1 दिसंबर 2021 के आदेश के पालन में 8 से 11 दिसंबर 2021 तक पयस्विनी नदी की नाप कराई गई।
और इस बार सरकारी जवाब में तीन महत्वपूर्ण दस्तावेजों की पुष्टि हुई—
सीमांकन रिपोर्ट तैयार हुई।
अतिक्रमणकारियों की सूची तैयार हुई।
स्थल पंचनामे तैयार हुए।
सरकार ने यह भी बताया कि संबंधित दस्तावेज विधानसभा पुस्तकालय में परिशिष्ट के रूप में रखे गए हैं।
यहीं से सवाल और गंभीर हो जाता है।
फरवरी 2021 में 18 अतिक्रमण हट चुके थे।
दिसंबर 2021 में पयस्विनी की फिर नाप हुई।
और उस नाप में अतिक्रमणकारियों की सूची तथा पंचनामे फिर तैयार हुए।
तो दोनों सरकारी तस्वीरों के बीच यह अंतर आया कहां से?
यही इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेजी प्रश्न है।
सूची बनी, लेकिन नाम सार्वजनिक क्यों नहीं?
आज भी सबसे जरूरी दस्तावेज वही 2021 की पयस्विनी सीमांकन रिपोर्ट का परिशिष्ट है।
किसके नाम थे?
किस खसरे पर कब्जा था?
कितनी भूमि नदी की थी?
किसे नोटिस मिला?
किसके खिलाफ धारा 248 की कार्रवाई हुई?
किसका कब्जा हटाया गया?
किसका नहीं?
किस मामले में बेदखली आदेश हुआ?
और सबसे महत्वपूर्ण—
जिस अतिक्रमण को हटाया गया, उसका मौके का पंचनामा कहां है?
इन सवालों का उत्तर केवल भाषण या प्रेस विज्ञप्ति से नहीं मिलेगा।
इसके लिए वही मूल दस्तावेज खोलना होगा जिसे सरकार ने विधानसभा पुस्तकालय में रखा था।
इसलिए किसी व्यक्ति का नाम बिना मूल परिशिष्ट देखे सार्वजनिक करना उचित नहीं होगा।
लेकिन सरकार से उस सूची को सार्वजनिक करने और नामवार कार्रवाई का हिसाब देने की मांग पूरी तरह दस्तावेजी आधार पर की जा सकती है।
नीलांशु के सवाल यहीं नहीं रुके
मंदाकिनी को लेकर नीलांशु चतुर्वेदी के विधानसभा प्रश्नों की श्रृंखला बताती है कि उनका फोकस केवल एक बार के सीमांकन तक सीमित नहीं रहा।
मार्च 2022 में उन्होंने मंदाकिनी के किनारे बने अवैध मकानों, भवनों, धर्मशालाओं और होटलों की संख्या तथा सरकारी भूमि पर हुए निर्माण का विवरण मांगा। उन्होंने यह भी पूछा कि नदी में मलवा या गंदा पानी डालने वाले होटलों पर क्या कार्रवाई की गई।
दिसंबर 2022 में फिर उन्होंने मंदाकिनी की स्थिति को लेकर सीवर लाइन और प्रदूषण का सवाल उठाया। विधानसभा रिकॉर्ड में उनका प्रश्न दर्ज है कि क्या चित्रकूट की जीवनरेखा मंदाकिनी “काला पानी” जैसी स्थिति भुगत रही है और सीवर लाइन का काम कब पूरा होगा।
2023 में भी उन्होंने मंदाकिनी किनारे लगे अर्जुन के पेड़ों की कटाई और नदी में प्रदूषणयुक्त पानी मिलने का मामला विधानसभा में उठाया।
अर्थात नदी का सवाल उनके विधानसभा कार्यकाल में एक घटना नहीं, लगातार उठाया गया विषय रहा।
और एक सवाल—मंदाकिनी की नाप क्यों नहीं?
10 मार्च 2022 का विधानसभा जवाब एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने लाता है।
जब पयस्विनी की नाप और सीमांकन का रिकॉर्ड सरकार ने प्रस्तुत किया, तब मंदाकिनी की नाप के संबंध में सरकार ने बताया कि उस समय ऐसी कार्रवाई प्रचलित या विचाराधीन नहीं थी।
यानी जिस मंदाकिनी को चित्रकूट की जीवनरेखा कहा जाता रहा, उसकी सीमा को लेकर उस समय तक वह व्यापक वैज्ञानिक सीमांकन नहीं हुआ था जिसकी मांग विधायक लगातार कर रहे थे।
यही वह जगह है जहां आज की स्थिति और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
2026 की बाढ़ ने पांच साल पुराने सवाल फिर सामने ला दिए
2026 की भीषण बाढ़ के बाद नदी और उसके किनारों पर बने निर्माणों का सवाल फिर सामने है।
यूपी और एमपी प्रशासन अब नदी सीमांकन, संभावित अतिक्रमण और बाढ़ क्षेत्र की पहचान की दिशा में फिर काम कर रहे हैं।
यानी जिस सवाल को 2021 में विधानसभा में उठाया गया था—
नदी की वास्तविक सीमा क्या है?
वह सवाल पांच साल बाद भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
यही इस कहानी का सबसे बड़ा प्रशासनिक प्रश्न है।
NGT भी नदी की जमीन का सीमांकन चाहता था
पयस्विनी और सरयू को लेकर NGT में उठे मामले ने भी नदी भूमि के सटीक सीमांकन की जरूरत पर जोर दिया था।
12 अगस्त 2021 की कार्यवाही में नदी भूमि के टोपोग्राफिकल सर्वे और सटीक सीमांकन तथा अतिक्रमण हटाने की मांग रिकॉर्ड पर थी।
इसका अर्थ साफ है—
नदी की सुरक्षा के लिए केवल पानी की धारा देखना पर्याप्त नहीं माना गया था; नदी भूमि की पहचान भी जरूरी थी।
फिर भी 2026 में वही सीमांकन और अतिक्रमण चिन्हांकन फिर प्रशासनिक एजेंडे पर आ गया।
यहीं से सवाल बनता है—
आदेश और कार्रवाई के बीच पांच साल कहां चले गए?
उपलब्ध रिकॉर्ड में इस देरी का कोई स्पष्ट, समग्र प्रशासनिक स्पष्टीकरण अभी सामने नहीं आता।
इसलिए सवाल किसी अधिकारी या व्यक्ति की मंशा पर नहीं, बल्कि व्यवस्था की जवाबदेही पर होना चाहिए।
नदी को उसकी सिकुड़ी हुई धारा से मत नापिए
2026 की नई कवायद का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यही होना चाहिए।
यदि नदी दशकों के अतिक्रमण से सिकुड़ चुकी है और अब केवल वर्तमान जलधारा को उसकी सीमा मान लिया गया, तो अतिक्रमण ही भविष्य की नदी सीमा बन सकता है।
इसलिए सीमांकन में कम से कम चार अलग-अलग चीजों को साथ देखना होगा—
पहला—वर्तमान सक्रिय जलधारा।
दूसरा—राजस्व अभिलेखों में दर्ज नदी भूमि।
तीसरा—पुरानी और प्राकृतिक नदी धारा।
चौथा—फ्लड-प्लेन और कैचमेंट एरिया।
इसके लिए पुराने राजस्व नक्शे, बंदोबस्त अभिलेख, ऐतिहासिक मानचित्र, सेटेलाइट इमेजरी, DGPS/GIS/Rover सर्वे और अधिकतम बाढ़ स्तर का तुलनात्मक अध्ययन होना चाहिए।
तभी पता चलेगा कि नदी वास्तव में कितनी थी और आज कितनी बची है।
नीलांशु की नदी-यात्रा का असली सवाल
ग्रामोदय में विद्यार्थी जीवन के दौरान मंदाकिनी को लेकर शुरू हुआ स्थानीय प्रयास, फिर डिजायर ग्रुप के माध्यम से नदी पुनर्जीवन की कोशिश, उसके बाद नगर निकाय की जिम्मेदारी और अंततः विधानसभा में नदी सीमांकन, प्रदूषण, अवैध निर्माण, सीवर और पयस्विनी संरक्षण पर लगातार प्रश्न—
यह एक व्यक्ति की राजनीतिक उपलब्धि का प्रचार नहीं, बल्कि एक सार्वजनिक मुद्दे के धीरे-धीरे संस्थागत सवाल बनने की कहानी है।
और यही कारण है कि नीलांशु चतुर्वेदी द्वारा 2021 में पूछे गए सवाल आज फिर प्रासंगिक दिखाई देते हैं।
उन्होंने पूछा था—नदियों का सीमांकन क्यों नहीं?
आज सवाल यह है—
सीमांकन हुआ तो उसका परिणाम क्या निकला?
उन्होंने पूछा था—अतिक्रमणकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं?
आज सवाल है—
2021 की सूची में दर्ज लोगों पर कार्रवाई का रिकॉर्ड कहां है?
उन्होंने पयस्विनी की नाप कराई।
आज सवाल है—
उस नाप के बाद नदी को कितनी जमीन वापस मिली?
और अब जब 2026 में फिर नदी नापी जा रही है, तो सबसे बड़ा सवाल है—
क्या इस बार केवल नदी की बची हुई धारा नापी जाएगी, या अतिक्रमण से पहले वाली नदी को खोजा जाएगा?
पांच साल बाद फिर वही सवाल
2018 — नदी सीमांकन और अतिक्रमण का मुद्दा विधानसभा में।
25 फरवरी 2021 — नीलांशु चतुर्वेदी का प्रश्न; सरकार ने 18 अतिक्रमण हटाए जाने की जानकारी दी।
12 अगस्त 2021 — NGT में नदी भूमि के सीमांकन और अतिक्रमण का मुद्दा।
8–11 दिसंबर 2021 — पयस्विनी की नाप; सीमांकन रिपोर्ट, अतिक्रमणकारियों की सूची और पंचनामे तैयार।
10 मार्च 2022 — विधानसभा में सरकार ने इन दस्तावेजों के अस्तित्व की पुष्टि की।
मार्च 2022 — मंदाकिनी किनारे अवैध मकानों, धर्मशालाओं, होटलों और नदी में प्रदूषण को लेकर फिर सवाल।
दिसंबर 2022 — मंदाकिनी की सीवर लाइन और प्रदूषण पर फिर सवाल।
2023 — नदी किनारे अर्जुन के पेड़ों की कटाई और प्रदूषण का मुद्दा फिर विधानसभा में।
अप्रैल 2026 — NGT में फिर नदी सीमांकन और अतिक्रमण कार्रवाई का प्रश्न।
सितंबर 2026 — बाढ़ के बाद यूपी-एमपी प्रशासन फिर नदी सीमांकन की प्रक्रिया में।
अंत में एक सवाल नहीं, चार सवाल
पयस्विनी की 2021 की सूची कहां है?
उस सूची के कितने लोगों पर कार्रवाई हुई?
2021 के सीमांकन के बाद नदी की कितनी भूमि अतिक्रमण मुक्त हुई?
और सबसे बड़ा—
2026 में होने वाला सीमांकन नदी की वर्तमान सिकुड़ी हुई धारा का होगा या उस प्राकृतिक नदी का, जिसे अतिक्रमण से पहले चित्रकूट जानता था?
क्योंकि नदी को बचाना है तो केवल पानी नहीं बचाना होगा।
नदी की जमीन भी बचानी होगी।
नदी का बहाव भी बचाना होगा।
नदी का कैचमेंट भी बचाना होगा।
और सबसे बढ़कर—नदी की पहचान बचानी होगी।
चित्रकूट की मंदाकिनी, पयस्विनी और सरयू का भविष्य अब नई घोषणाओं से नहीं, पुरानी फाइलों के खुले पन्नों और जमीन पर दिखाई देने वाली कार्रवाई से तय होगा।



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